भेड़ाघाट एक परिचय

प्रस्तुति – जयनारायण मिश्रा, नगर परिषद, भेड़ाघाट

प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से दक्षिण पष्चिम में 21 कि.मी. की दूरी पर हरीतिमा युक्त पहाड़ियों से घिरा नर्मदा के बीचों बीच बसा भेड़ाघाट ऐतिहासिक] धर्मिक] पुरातत्वीक] सांस्कृतिक महत्ता एवं नैसर्गिक सौंदर्य में लिप्त मनोहारी छटाओं से अभिभूत प्राचीन ऋषियों की तपस्यवी है।

लगभग 1000 शिल्पियों से युक्त सुबह से शाम तक पत्थरों के माध्यम से निर्जीवता को सजीवता प्रदान करने वाली षिल्पकला अपने आम में समेटे हुए लगभग 748 हेक्टेयर क्षेत्र में बसा भेड़ाघाट ग्राम वर्षा एवं शीत ऋतु में प्राकृतिक छटा से पर्यटकों को अनायास ही अपनी ओर मोड़ लेता है।

भेड़ाघाट नामकरण के संबंध में तीन किवदंतिया प्रसिद्ध है।

1.    पौराणिक ग्रंथों के मतानुसार भृगुऋषि यहाँ पर नर्मदा के किनारे तपस्या करते थे जिसके फलस्वरूप उनके नाम का आधार मानते हुए उनकी तप स्थली का नाम भेड़ाघाट रखा गया।

2.    ग्रामीण मतावलंबियों का कहना है, चूंकि यहाँ नर्मदा एवं बैनगंगा का भेड़ा (संगम) हुआ है इसलिए इस जगह का नाम भेड़ाघाट होना स्वाभविक है।

3.    तीसरा मत है कि प्राचीन समय में उत्तरी एवं दक्षिणी भारत को जोड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक केन्द्र होने के कारण यहां नावों का बड़ा बेड़ा होने के कारण बेड़ाघाट था और बाद में अपभृंष होकर भेड़ाघाट बना।

भेड़ाघाट में पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण का केन्द्र मनोहारी प्राकृतिक हरियाली संयुक्त नैसर्गिक संगमरमरीय वादियां हैं जो अन्यत्र दुर्लभ हैं विष्व में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ सगमरमर के पहाड़ को चीर कर कोई नदी प्रवाहित होती हो, किंतु भेड़ाघाट इसका अपवाद है, बहुरंगी संगमरमरीय चट्टानों के बीच नर्मदा का प्रवाह कहीं बेहद क्रुद्ध है तो कहीं किसी योगी सा धीर गंभीर, ऐसा प्रतीत होता है कि अमरकंटक से लेकर अरब सागर तक की अथक यात्रा में माँ नर्मदा ने अपना समूचा श्रृंगार यहीं किया हो नर्मदा के दोनों पाटों के प्राकृतिक दृष्य सुंदर आभूषणों के सदृष्य सजे लगते हैं इस संपूर्ण नैसर्गिक वातावरण को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो विश्वकर्मा ने फुरसत के साथ अपने संपूर्ण कौषल को ढाल दिया है।

नगिन की तरह बलखाती नर्मदा का जल जब चट्टानों से टकराकर इंद्रधनुषि रंग बिखेरता है तब किसी आनंदमयी संगीत का एहसास होता है, नदी की वेगवती जलधारा की कल कल ध्वनि के साथ जब संध्या समय रस से भीगे पक्षी अपनी मधुर साज मिलाते हैं तब अनायास ही गंधर्व तानसेन की याद ताजा हो उठती है ऐसे में मन करता है कि चिंता से भागती इस दुनिया की भीड़ से दूर हटकर आत्मिक शान्ति के लिए घड़ी दो घड़ी इस मधुर संगीत का रसास्वादन अवष्य किया जाए।

पौराणिक एवं धार्मिक संदर्भों में भेड़ाघाट का अपना एक विशिष्ठ स्थान है देवासुर संग्राम में त्रिपुरासुर वध की पश्व भूमिक भी यही स्थली है। नर्मदा स्थल शिव स्थल तो माना ही गया है पौराणिक आख्यान के अनुसार महाबली त्रिपुर के तीन पुरों में जो तांबा स्वर्ण एवं लोहे के निर्मित थे, को शंकर ने अपने त्रिशूल से नष्ट किया, अघोरी तांत्रियों के अनुष्ठानों एवं तामसी पूजा विधियों से सामाजिक मुक्ति हेतु वैदिक एवं वैष्णव मतावलंबियों राजाओं द्वारा किया गया युद्ध यहाँ के पौराणिक आख्यान का सारांश है। धर्मिक आख्यानों के अनुसार गंगा में तो स्नान के पश्चात मानव पवित्र माना गया है किंतु नर्मदा के दर्शन मात्र से ही मनुष्य का जीवन सफल माना गया है।

भेड़ाघाट क्षेत्र में शांत धीर गंभीर चट्टानों के मध्य कलकल करती नर्मदा की सूरज और चंदा की किरणों में नहाती सी नीली धार ह्रदय को चंचल कर देने वाली एकांतता यह सब दिवास्वपन सा प्रतीत होता है।

अनेक प्रतापी राजाओं का कार्यक्षेत्र यह भेड़ाघाट जिनके स्मृति चिन्हों का जीता जागता उदाहरण यहाँ का प्रसिद्ध तांत्रिक स्थल पचमठा मंदिर जहाँ कभी सरस्वती घाट में जलती चिता एवं मंदिर में स्थापित शिव प्रतिमा की आरती एक साथ हुआ करती थी। वह मंदिर आज भी अपनी गौरव गाथा की झंकार करता हुआ प्रतीत होता है।

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